मेरी कविता श्री अमिताभ बचचन जी के लीये उन के जनम दिवस पर
कुछ साल पहले की ये बात हे।
श्री हरिवंस राय बचचन के घर आई पुत्र की सौगात हे।
सीधा,सरल,नम्र हे,फिर भी उसका इक अलग अंदाज़ हे।
कद में थोडा सा ऊँचा हे,और आवाज़ बडी दमदार हे।
जिंदगी खुद उससे जीना शिखती हे आज,उसका सफर बड़ा लाजवाब हे।
आओ दिखाता हु मेरी नज़र से आप को,आओ दिखाता हु मेरी नज़र से आप को।
ये विजय भी हे,ये इकबाल तो कभी अन्थोनी,और यही तो हे जो बागबान हे।
वेसे तो दिल से बड़ा अमीर हे।
मगर पता तब चला लोगो को जब आई ज़ंजीर हे।
फिर जो उठा हे सर उसका फिर कभी जुक नहीं पाया हे।
फिल्मो के इतिहास में एक ही एंग्री यंग मेन आया हे।
फिर सफलता के धोड़े पे जो हुआ सवार।
फिर तो कई मुकाम बने कई आयाम रोक सकी ना उसे कोई दीवार।
फिर रुका नहीं वो थमा नहीं।
कोई किरदार नहीं जो उसने किया नहीं।
कभी कालिया तो कभी बादशाह कभी विजय तो कभी सिकंदर।
सिर्फ एक ही हे और एक ही रहेगा सिनेमा का ये इश्वर
लिखितन
विपुल बोरिसा
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