Thursday, 6 August 2015

Ghazal

दोनों तरफ एक जैसा ही मंज़र हे ।
छुपा रहे हे दोनों,जो दिल के अंदर हे l

वेसे तो फूल यहाँ खिलते हे,हरतरफ
ऐसे भी बाग़ हे यहाँ,जो बंजर हे ।

हम तो तैयार कब से हे खडे,दिलभर
हमें पता हे,तेरी आँखे ही खंजर हे ।

इतना ही गुमाँ हे,तो आ आज़माले
दिल तो, हम भी रखते समंदर हे ।

तु थक जायेगी बेवफाई करते-करते
वफ़ा के तो हम आज भी सिकंदर हे ।

विपुल बोरीसा

No comments:

Post a Comment