Saturday, 15 August 2015

आज़ादी - 69

जब भी अगस्त और जनवरी आती हे,
तभी क्यों सब को देश की याद आती हे।

दिल में जिसे सजाना चाहिये,उस तिरंगे से
सिर्फ एक दिन क्यों गलिया सजाई जाती हे।

देश का हाल सच में क्या जाना हे तुने,
बस स्टेटस और प्रोफाइल बनाइ जाती हे ।

बस तु खामोश बनकर तमाशा देख
सच के बाज़ार में यहाँ,जूठ की सप्लाई जाती हे।

सोच ना यार,क्या सच में तु आज़ाद हे ?
साथ में दीवाली और ईद,कहाँ मनाई जाती हे ।

जब भी अगस्त और जनवरी आती हे,
तभी क्यों सब को देश की याद आती हे ।

विपुल बोरीसा

Sunday, 9 August 2015

ग़ज़ल -10.08.15

बे-इन्तहा,बे-खौफ सी चाहत हे मेरी ।
जिस्म से नही,रूह से मोहब्बत हे मेरी ।

हर वक़्त तो में पास नहीं होता उसके
फिर भी मेहसूस उसे ,हरारत हे मेरी ।

जब भी करता हु,याद उसको दिल से
हाथ जोड़ लेता हु,यही इबादत हे मेरी ।

कुछ इस तरह छु लेते हम,एक दूसरे को
हर हरकत संभाली हे,ये हिफाज़त हे मेरी ।

अगर जुदा ही करना था,तो मिलाता क्यु हे
बस ईतनी ही खुदा तुज से,शिकायत हे मेरी ।

विपुल बोरीसा

Thursday, 6 August 2015

Ghazal

दोनों तरफ एक जैसा ही मंज़र हे ।
छुपा रहे हे दोनों,जो दिल के अंदर हे l

वेसे तो फूल यहाँ खिलते हे,हरतरफ
ऐसे भी बाग़ हे यहाँ,जो बंजर हे ।

हम तो तैयार कब से हे खडे,दिलभर
हमें पता हे,तेरी आँखे ही खंजर हे ।

इतना ही गुमाँ हे,तो आ आज़माले
दिल तो, हम भी रखते समंदर हे ।

तु थक जायेगी बेवफाई करते-करते
वफ़ा के तो हम आज भी सिकंदर हे ।

विपुल बोरीसा