आज तो हम भी इक आश लिये बैठे हे ।
अपनी मौत का सामान खास लिये बैठे हे ।
बड़े दिनों, बड़े मुद्दतो के बाद मिली हे हमे,
उसकी एक तसवीर जो पास लिये बैठे हे ।
नब्ज़ चलती हे, मगर पहेले की तरह नही,
रूह मर चुकी और जिंदा लाश लिये बैठे हे ।
जानते हे, अब कुछ हो तो सकता नही,
फिर भी न जाने क्यु वो काश लिये बैठे हे ।
मौत भी जालिम हो गई हे, बेवफ़ा उसकी तरह
न जाने किसकी दुआ, कितनी साँस लिये बैठे हे ।
विपुल बोरीसा