Sunday, 9 August 2015

ग़ज़ल -10.08.15

बे-इन्तहा,बे-खौफ सी चाहत हे मेरी ।
जिस्म से नही,रूह से मोहब्बत हे मेरी ।

हर वक़्त तो में पास नहीं होता उसके
फिर भी मेहसूस उसे ,हरारत हे मेरी ।

जब भी करता हु,याद उसको दिल से
हाथ जोड़ लेता हु,यही इबादत हे मेरी ।

कुछ इस तरह छु लेते हम,एक दूसरे को
हर हरकत संभाली हे,ये हिफाज़त हे मेरी ।

अगर जुदा ही करना था,तो मिलाता क्यु हे
बस ईतनी ही खुदा तुज से,शिकायत हे मेरी ।

विपुल बोरीसा

No comments:

Post a Comment