बे-इन्तहा,बे-खौफ सी चाहत हे मेरी ।
जिस्म से नही,रूह से मोहब्बत हे मेरी ।
हर वक़्त तो में पास नहीं होता उसके
फिर भी मेहसूस उसे ,हरारत हे मेरी ।
जब भी करता हु,याद उसको दिल से
हाथ जोड़ लेता हु,यही इबादत हे मेरी ।
कुछ इस तरह छु लेते हम,एक दूसरे को
हर हरकत संभाली हे,ये हिफाज़त हे मेरी ।
अगर जुदा ही करना था,तो मिलाता क्यु हे
बस ईतनी ही खुदा तुज से,शिकायत हे मेरी ।
विपुल बोरीसा
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