Thursday, 20 November 2014

शायर

कितनी भी मुट्ठी बंध रखो वक़्त रेत् की तरह फिसल ही जायेगा ।
आज शायद दौर मेरा नहीं ,कल शायद दौर मेरा भी आयेगा ।

मेने हर रोज नये रंग मे वक़्त को सजते सवरते तो कभी उजड़ते देखा हे ।
आना जाना तो लगा रहेगा, ना मेरे लिये ना तेरे लिये ये वक़्त कहा ठेहरा हे ।

समन्दर की तरह गहराई रखो और हिमालय की तरह ऊंचाई रखो ।ज़ुकना भी जरुरी हे मेरे दोस्त जहा प्रेम ,मान,सम्मान मिले वहा हंमेशा शीश जुकाई रखो ।

मे आज हु तो शायद कल नहीं,कुछ सुरख पन्नो पे शायद तस्वीरो की तरह बन जाऊ किसी की सोच बनु या शायद किसी को याद आऊ ।

मे बड़ा तो नहीं, मगर शायद कुछ बन पावु ।बहोत शिद्दत से कोशिश करता हु के कुछ अच्छा लिख पावु ।

कोशिश यही करता हु,और खुदा से यही माँगता हु,सुजली हुई नहीं एक मासूम बच्चे की हसी की तरह मेरी लिखाई रखो ।

मुझे इश्वर नहीं बनना,इंसान बन जाऊ तो बहोत हे।हा, मुझे बस शायर बनाई रखो ।

लिखितन
विपुल बोरीसा

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