"कश्मीर" के अभी जो हालात हे उस पर लीखी मेरी ये कविता
आज मरे भी मन में इक उबाल आया।
ये बारिश का जूनून देख कर
हर एक मासूम से चेहरे पे सवाल आया।
ये बारिश का जूनून देख कर
ये धरती के जन्नत पे कोन सा फिर बवाल आया।
ये बारिश का जूनून देख कर
कल जो था अमीर वो आज कंगाल आया।
ये बारिश का जूनून देख कर
ये आतंक क्या कम था खुदा जो तू अब ये माहोल लाया।
ये बारिश का जूनून देख कर
अब हिंदू कया अब मुस्लिम क्या इंसान को बचाने इंसान आया।
ये बारिश का जूनून देख कर
"तू अब रुक जा ए बारिश"हर शख्स के दिल से यही मलाल आया।
ये बारिश का जूनून देख कर
आज मेरे भी मन में फिर इक उबाल आया।
ये बारिश का जूनून देख कर
लिखितन
विपुल
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